12 जनवरी, 2014

खोजूं कहाँ




खोजूं कहाँ तुझे
ए मेरे मन
न जाने कहाँ
 खो गया है
चैन सारा हर लिया है |
खैर  मना कि मैंने
दर्ज न कराई
कोई शिकायत
तेरे खो  जाने की
नहीं तो क्या हाल होता |
कैद से
 निकल नहीं पाता
रोता चीखता
कितनी भी
 मिन्नतें करता |
आभार मान  सब का 
किसी ने बंधक न बनाया
बहुत मुश्किल से 
तेरा सुराग पाया |
हूँ आश्वस्त 
कभी तो मिलेगा 
मेरी खोज का 
अंत होगा |

आशा

10 जनवरी, 2014

जलता दिया

(१)
जलता दिया 
तम तभी हरता 
जब स्नेह हो |
(२)
रीतते रिश्ते 
मन दुखी करते
नैन हें  नम |
(३)
जश्न ही मना
प्रातः से संजा तक 
ना कर काम |
(४)
फंसा जाल में
धूमिल होती आशा
शेष निराशा |
(५)
जीवन धन
नाम निराशा नहीं
आशा ही आशा |
(६)
सुख क्षणिक
आभास नहीं होता
दुखी संसार |
(7)
दुःख बसा है
रग रग में तेरे
कैसे सुखी हो |
(8)
सूनी गलियाँ
रंग रसिया बिन
होली कैसे हो |
(9)

होली में रंगी
भीगी लट उलझे
रंग छूटे ना |
आशा









08 जनवरी, 2014

महाकवि काली दास



कहता हूँ मैं एक कहानी
उज्जैनी नगरी मैं जानी
पेड़ पर बैठा एक युवक 
हाथ में लिए कुल्हाड़ी
जिस डाल पर बैठा था
उसे ही काट रहा था |
ज्ञानी तरसे उसकी अक्ल पर
धीरे से उसे उतारा
कुछ प्रश्न किये
 वह मूक रहा  |
इसी बात से हो  उत्साहित
पहुंचे राज दरवार में
शास्त्रार्थ का न्योता
राजकुमारी विद्योत्तमा को भिजवाया
जो बैठी थी प्रण किये
 होगा निपुण  शास्त्रों में जो
वही पति होगा उसका |
शास्त्रार्थ होने लगा
काली दास के  मौन इशारे  
ज्ञानी की उन  पर व्याख्या ने
काली दास को विजयी बनाया |
वह राजकुमारी व्याह कर लाया
पाकर  निपट गवार अनपढ़ पति 
विदूषी थी बहुत दुखी
डाटा फटकारा और घर से बेघर किया
वह जंगल जंगल भटका
ज्ञान अर्जित किया  
यही कहानी है उसकी 
जो बाद में प्रसिद्ध महाकवि हुआ
उज्जैनी की शान हुआ 
राजा विक्रम की राजसभा में 
प्रमुख महाकवि कालीदास हुआ |
आशा

06 जनवरी, 2014

स्वप्न (क्षणिका )

शाम ढली निशा ने पैर पसारे
हम तब भी स्वप्नों से न हारे
 किसी न किसी में खोए रहे
सुबह कब हुई जान न पाए |
आशा

03 जनवरी, 2014

भावनाओं का सैलाव

 भावनाओं  का सैलाव
 कहाँ ले जाएगा 
भेद अपने पराए में
 कर न पाएगा |
प्यार के सरोवर में
 तैरेगा कैसे 
किनारा है बहुत दूर
 पहुँच न पाएगा |
ये ही मन 
 अस्थिर करती हैं
कोइ नियंत्रण
नहीं इन पर |
बेचैन मन कब तक
दे साथ इनका
कहीं उलझ  न जाए
शिकारी के जाल में|
वह तो घात लगाए
बैठा होगा
जाने कब कोइ फँस जाए
उसके जाल में |
है कठिन
 नियंत्रण उन पर
पर सावधानी भी
 तो जरूरी है |
जब तैरना नहीं आता
क्या फ़ायदा
सरोबर में उतरने का
ज़रा सी भूल में
जीवन शेष हो जाएगा |
आशा |


02 जनवरी, 2014

जीने न दे---







जीने न देते
बीते कल के साए
आहत हूं मैं |
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है कलाकार
रंग मंच पर छा
ना छोड़ आस |

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कर प्रकाश
मोम बत्ती रात में
हम हें साथ |
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साथ न आना
धुंआ बन रहना
आसमान में |
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यह पतंग
प्रेम रंग में रंगी
उड़े व्योम में |
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 यह दर्पण

दामन सच्चाई का

 झूट न बोले 





सुस्वागतम 
ए नव वर्ष आज
खिले सुमन |
यह आइना
 चिढ़ाता है मुझको
मुझे जाने ना |
  
जश्न ही मना 
प्रातः से संजा तक 
ना कर काम |
आशा