16 जनवरी, 2014

चेहरा तेरा

चेहरा तेरा
दर्प से चमकता
सच्चे मोती  सा |
२-
रिश्ता प्यार का
निभाना है कठिन
आज ही जाना |
३-
यूं  न देखते
सोचते समझते
तुझे निभाते |
४-
किया अर्पण
पूरा जीवन तुझे
तूने न जाना |
५-
बूँद स्वेद की
कम नहीं अश्रु से
पीर झलकी |
६-
हुआ चयन
दो बूँद अश्क झरे
मूंदे नयन |

-तिल गुड़ से
बनते लड्डू मीठे
संक्रांति मने |

ईद आ गयी
शीर खुरमा पका
मिठास बड़ी |

14 जनवरी, 2014

सर्द हवाएं



सर्द हवाएं
है धवल चादर
ठिठुरी वादी |

दीदार तेरा
हरता मन मेरा
दीवाना हुआ |

ए मेरी सखी
तू सब भूल गयी
हुई बेगानी |

खिला कमल
झाँक रहा जल में
हो कर मुग्ध |

सुख क्षणिक
आभास नहीं होता
दुखी संसार |

दुःख बसा है
रग रग में तेरे
कैसे सुखी हो |

छटा कोहरा
नन्हीं बूँदें जल की
झरने लगीं |

कुसुम पर
एक बूँद ओस की
रही थिरक  |
आशा

12 जनवरी, 2014

खोजूं कहाँ




खोजूं कहाँ तुझे
ए मेरे मन
न जाने कहाँ
 खो गया है
चैन सारा हर लिया है |
खैर  मना कि मैंने
दर्ज न कराई
कोई शिकायत
तेरे खो  जाने की
नहीं तो क्या हाल होता |
कैद से
 निकल नहीं पाता
रोता चीखता
कितनी भी
 मिन्नतें करता |
आभार मान  सब का 
किसी ने बंधक न बनाया
बहुत मुश्किल से 
तेरा सुराग पाया |
हूँ आश्वस्त 
कभी तो मिलेगा 
मेरी खोज का 
अंत होगा |

आशा

10 जनवरी, 2014

जलता दिया

(१)
जलता दिया 
तम तभी हरता 
जब स्नेह हो |
(२)
रीतते रिश्ते 
मन दुखी करते
नैन हें  नम |
(३)
जश्न ही मना
प्रातः से संजा तक 
ना कर काम |
(४)
फंसा जाल में
धूमिल होती आशा
शेष निराशा |
(५)
जीवन धन
नाम निराशा नहीं
आशा ही आशा |
(६)
सुख क्षणिक
आभास नहीं होता
दुखी संसार |
(7)
दुःख बसा है
रग रग में तेरे
कैसे सुखी हो |
(8)
सूनी गलियाँ
रंग रसिया बिन
होली कैसे हो |
(9)

होली में रंगी
भीगी लट उलझे
रंग छूटे ना |
आशा









08 जनवरी, 2014

महाकवि काली दास



कहता हूँ मैं एक कहानी
उज्जैनी नगरी मैं जानी
पेड़ पर बैठा एक युवक 
हाथ में लिए कुल्हाड़ी
जिस डाल पर बैठा था
उसे ही काट रहा था |
ज्ञानी तरसे उसकी अक्ल पर
धीरे से उसे उतारा
कुछ प्रश्न किये
 वह मूक रहा  |
इसी बात से हो  उत्साहित
पहुंचे राज दरवार में
शास्त्रार्थ का न्योता
राजकुमारी विद्योत्तमा को भिजवाया
जो बैठी थी प्रण किये
 होगा निपुण  शास्त्रों में जो
वही पति होगा उसका |
शास्त्रार्थ होने लगा
काली दास के  मौन इशारे  
ज्ञानी की उन  पर व्याख्या ने
काली दास को विजयी बनाया |
वह राजकुमारी व्याह कर लाया
पाकर  निपट गवार अनपढ़ पति 
विदूषी थी बहुत दुखी
डाटा फटकारा और घर से बेघर किया
वह जंगल जंगल भटका
ज्ञान अर्जित किया  
यही कहानी है उसकी 
जो बाद में प्रसिद्ध महाकवि हुआ
उज्जैनी की शान हुआ 
राजा विक्रम की राजसभा में 
प्रमुख महाकवि कालीदास हुआ |
आशा

06 जनवरी, 2014

स्वप्न (क्षणिका )

शाम ढली निशा ने पैर पसारे
हम तब भी स्वप्नों से न हारे
 किसी न किसी में खोए रहे
सुबह कब हुई जान न पाए |
आशा