23 जनवरी, 2021

शिक्षा एक विचार

 

03 सितंबर, 2012

शिक्षा एक विचार



व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा का बहुत महत्व है |शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो अनवरत चलती रहती है जन्म से मृत्यु तक |जन्म से ही शिक्षा प्रारम्भ हो जाती है |शिशु अवस्था में माता बच्चे की पहली गुरु होती है |यही कारण है कि संस्कार जो मिलते हैं मा से ही मिलते हैं |जैसे जैसे वय  बढती है  बच्चे पर और लोगों का प्रभाव पडने लगता है |आसपास का वातावरण भी उसके विकास में एक महत्वपूर्ण  कारक होता है |
स्कूल जाने पर शिक्षक उसका गुरू होता है |बच्चों में अंधानुकरण की प्रवृत्ति होती है
जो उन्हें सब से अच्छा लगता है वे उसी का अनुकरण करते हैं और उस जैसा बनना चाहते हैं |
यही कारण है कि बच्चा अपने शिक्षक का कहा बहुत जल्दी  मानता है |
      जब वह कॉलेज में पहुंचता है तब मित्रों से बहुत प्रभावित होता है और उनकी संगत से बहुत कुछ सीखता है |इसी लिए तो कहते हैं :-
         पानी पीजे छान कर ,मित्रता कीजे जान कर 
शिक्षा में यात्रा का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान है |यात्रा करने से भी कुछ कम सीखने को नहीं मिलता |कई लोगों के मिलने जुलने से ,विचारों के आदान प्रदान से ,कई संस्कृतियों को देखने से ,प्रकृति के सानिध्य से बहुत कुछ सीखने को मिलता है  |  केवल वैज्ञानिक सोच ,अनुकरण ,बौद्धिक विकास ही केवल शिक्षा नहीं है |सच्ची शिक्षा है अपने आप को जानना सुकरात ने कहा था
कि सही शिक्षा है know thyself “ चाहे जितना पढ़ा लिखा पर यदि वह अपने आपको  न जान् पाए तो सारी शिक्षा व्यर्थ है |
यही कारण है कि शिक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बच्चे में छिपे
सद् गुणों को  समझे और उनके विकास में सहायक हो |वह बालक को,उसके गुणों को , सीपी में छिपे मोती को बाहर निकाले और तराशे ऐसा कि बालक जान पाए कि आज के दौर में वह कहाँ खडा है और उसका सम्पूर्ण विकास कैसे  हो सकता है |
आशा

22 जनवरी, 2021

बहुत दूर से लिए गए कश्मीर घूमने जाते समय के दृश्य

(चश्में शाही )


(फूलों से सजा बागीचे का रंगीन समा )
                                                                    (ड़लझील में हाउस बोट)

 

दूसरे दिन होटल की खिड़की से झांक कर देखे झील के दृश्य बहुत सुहाना मौसम था |इतने में बैन वाला हमें पिकअप करने आ गया |सारे दिन घूमें शाम को चार  चिनार बोट में बैठ कर गए और छोटे से बागीचे में घूमें |फिर तीसरे दिन कश्मीर के बाहर केसर के खेत देखे |वहां सहकारी बाजार से केशर भी खरीदी |सच में बहुत आनंद आया जन्नत के दृश्य  दर्ख कर  |लग रहा था कि काश और अवकाश होता |या ये मनोभावन पल मन के कैनवास में  उकेर लिए जाते | 

आशा













































दृध्य  डल  का होटल से                                                                         
 

21 जनवरी, 2021

17 जनवरी, 2021

यात्रा विवरण (काश्मीर )


देहली से जम्मू के लिए विमान का टिकिट था |बहुत उत्साह था पहली बार विमान से जाने का |समय  कब निकला मालूम ही नहीं पड़ा |विमान में खिड़की की सीट मिली थी ऊपर से नीचे के दृश्य बहुत ही मन भावन दिखे |जम्मू पहुँचते ही कल्पना जगत में खो गई |आगे की यात्रा भी विमान से होनी थी |रात्रि में एक होटल में रुके |सुबह आठ बजे का टिकिट था |अतः जल्दी से तैयार हुए और विमान तल की ओर चल दिए |बहुत पहले पहुँच गए | बाहर कुछ लोग बड़े बड़े पोटले ले कर बैठे थे | मैंने पूंछ ही लिया आप कहाँ  जारहे हैं  वे बोले श्रीनगर जा  रहें हैं| समय पर उड़ान भरी |रास्ते में टिकिट चेकर ने नाम ले ले कर सब के आने की जानकारी चाही |एक व्यक्ति का नाम बार बार लिया पर वह नहीं बोला |

   अचानक दृष्टि उस पोटली बाले पर जा कर टिक गई |यह वही पोटली वाला था |जिससे मैंने सुबह बात की थी |वह इतना व्यस्त था अपनी पोटली सम्हालने में कि मुझे ताज्जुब हुआ |इतनी बड़ी पोटली कैसे उसने विमान के अन्दर बैठने के स्थान पर रख ली थी | उसने बताया था कि वह अपना सामन विमान से ही ले जाता आता है |

बहुत जल्दी ही हम श्री नगर विमान ताल पर पहुँच गए |अपना सामान लिया और बाहर टेक्सी का इन्तजार कर रहे थे कि एक सज्जन ने आकर पूंछा क्या आप उज्जैन से आए हैं ?बड़ा आश्चर्य हुआ कि यहाँ हमारी जानकारी लने  वाला कौन है |गुड्डी के फेसबुक  में मित्र ने अपने एक मातहत को भेजा था हमें रिसीव करने |उसने डल झील

के सामने होटल में रूम बुक करवा लिया |खिड़की से झील का नजारा

बहुत सुन्दर दीखता था |झील में तैर रहीं मोटर बोट बहुत आकर्षित कर रहीं थीं |शाम को घूमने का प्लान बनाया पहले दिन होटल से बाहर निकले और पैदल चल दिए झील के किनारे किनारे |फिर लौट आए

रात्रि का भोजन होटल में ही किया |दूसरे दिन बाहर जाने का मन था |टेक्सी के आते ही पहल गाँव की ओर जा रहे थे |जितना सुन्दर श्री नगर है वहां के गाँव बहुत ही गंदे लगे |लोग भी मैले कुचेले कपडे पहने

अपने अपने कामों में व्यस्त थे |दोपहर में पहल गाँव में भोजन किया और घूमा |   

















                      

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

यात्रा विवरण -१(वैष्णो देवी )

बहुत दिनों से सोच रहे थे कोई नवीन जगह देखें |सोचा क्यूँ न जन्नत की सैर की जाए|पहले वैष्णो देवी जाने का प्रोग्राम बनाया |टिकट की रिजर्वेशन करवा ली |ज्यादा भीड़ नहीं थी आसानी से टिकट मिल गया |

साथ में बड़ी बेटी और बच्चे थे इस कारण  जाने में बहुत सुविधा रही

पर कटरा पहुँचते शाम हो गई थी |थकान बहुत हो गई थी इसलिए रात में होटल में रुके |दूसरे दिन सुबह पांच बजे देवी दर्शन को जाना था | सुबह की बस पकड़ी और लगभग दो घंटे बाद हम अपने गंतव्य स्थल पर पहुँच गए |पर बेटी के  बड़े बेटे को बुखार आ गया |इसकारण उन लोगों ने दर्शन का इरादा टाल दिया |वैसे भी वे लोग पहले जा चुके थे |दूसरे दिन प्रातः हम लोग दर्शन को निकले |पहले सोच रहे थे कि पैदल ही जाएंगे पर थोड़ी दूर चल कर ही थकान होने लगी |हमने घोड़े पर जाने का मन बनाया |और घुड़सवारी  का आनंद लिया भरपूर |लगभग दो घंटे बाद एक प्रांगण में जा पहुंचे |देखा बहुत लम्बी कतार लगी थी दर्शनार्थियों की |हम भी कतार में शामिल हो गए |धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे |करीब एक घंटा लगा देवी के दर्शन में |पर जब वहां पहुंचे आधे मिनिट भी रुकने न दिया जिससे दर्शन ठीक से कर पाते |आगे बढ़ो आगे बढ़ो कहते स्वयंसेवकों ने तो ध्यान  से दर्शन ही नहीं करने दिए |बड़े बेमन से आगे बढे | बहुत जल्दी ही हम फिर से उसी

आँगन में खड़े थे |वहां की खिड़की से प्रसाद लिया और लौट चले |

भैरो मंदिर बहुत ऊंचाई पर था |वहां जाने का इरादा कैंसिल कर दिया |फिर से घोड़ों पर हुए सवार और नीचे उतर आए |नीचे गुलशन कुमार का स्टाल था उससे कुछ कसेट खरीदे |लौटते समय बाजार से छिले अखरोट खरीदे | और बापिस होटल में आगये  |

आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

16 जनवरी, 2021

नन्हीं परी


                                                         हुस्न तेरा क्या कहिये

किसी हूर से कम नहीं तू

या है एक नन्हीं परी

श्वेत वस्त्रों से सजी है |

पंख भी हैं धवल तेरे

प्यार से जब भी देखती

सारी कायनात रौशन होती

जन्नत नजर आने लगती |

 जब रौद्र रूप धारण करती

सांस हलक में अटक जाती

दृष्टि देख सहम जाती

मेरी  जान निकल जाती |

|आशा

14 जनवरी, 2021

=बालिका से बनी गृहणी

 बनती सवरती बिंदास रहती 

गृह कार्य में रूचि न रखती 

जब छूटा  बाबुल  का अंगना 

तब मुंह बाए खड़ी थीं समस्याएँ अनेक |

जिधर देखो यही कहा जाता 

कुछ भी तो आता नहीं

 कैसे घर चला पाएगी 

किस किसके मुंह पर ताला लगाती | 

पर वह हारी नहीं 

धीरे से  कब कुशल गृहणी में बदली 

जान नहीं पाई  |

जानना चाहते हो  कैसे ?

यह था लगन का चमत्कार 

जिस कार्य को करने को सोचा 

जी जान लगा दी उसने 

कभी सफल् हुई कभी हारी 

\पर हिम्मत नहीं हारती  |

यही एक गुण था उसमें  ऐसा 

जहां जाती  सफलता उसके कदम चूमती 

जिससे सभी क्षेत्रों में हुई सफल 

कुशल गृहणी कहलाई |

आशा