07 जुलाई, 2013

मकसद


मैंने चुना है एक मकसद
वहां तक पहुँचने का
एकता के सूत्र में
सब को बांधने का
नहीं जानती कहाँ तक
सफलता पाऊँगी
कितनी सीड़ी चढ़ पाऊँगी |
यह तो जानती हूँ
करना होगा
 कठिन प्रयास
पूर्ण लगन से
तन मन धन से
पर नहीं जानती
कितना बाँध पाऊँगी गैरों को
अपनेपन के बंधन में |
समझ रही हूँ
गैरों से व्यवहार अपनों सा
इतना सहज भी नहीं
कई बाधाएं
 पथ बाधित करेंगी
यदि उनसे भयभीत हुई
मन कुंठित हुआ
तब मकसद
 पूर्ण न हो पाएगा |
पर इतना जानती हूँ
कदम पीछे हटाना
मैंने नहीं सीखा
पथ से भटक जाना
मुझे नहीं आता |
हूँ इसीलिए आशान्वित
जो मार्ग चुना है मैंने
अडिग उसी पर रहूँगी
एकता का बधन
इतना सुदृढ़  होगा
कभी टूट न पाएगा |
आशा

03 जुलाई, 2013

पर मनुष्य बदलता जाता



श्वेत अश्वों के रथ पर सवार
सूर्य निरंतर आता जाता
अपने पथ से कभी न भटकता
प्रातः रश्मियों से स्वागत
सांझ ढले अस्ताचल जाना
यही क्रम  अनवरत चलता
चन्दा की चौदह कलाएं
बिखेरतीं अपनी अदाएं
कभी चांदनी रात होती
 कभी रात अंधेरी आती
ज्योत्सना इतनी स्निग्ध होती
 कोई सानी नहीं जिसकी
यही क्रम सदा चलता रहता
कोइ परिवर्तन नहीं होता
दाग भी दिखाई देता
चाँद  में फिर भी
वह उसे नहीं छिपाता
निरंतरता में कोई भी
 व्यवधान नहीं आता
सृष्टि की विशिष्ट कृति
 मानव है सबसे भिन्न
जुगनू सा जीवन उसका
टिमटिमाता सिमट जाता
पर कोइ दो एक से नहीं
भिन्न व्यवहार आपस में  उनके
भिन्न भिन्न आचरण उनके
कदम कदम पर बदलाव
कोइ निरंतरता नहीं
यदि दाग कोई लग जाए
छूटे या ना छूटे
उसे फर्क नहीं पड़ता
सहजता से उसे छिपा जाता
प्रकृति में परिवर्तन न होता
पर मनुष्य बदलता जाता
आचरण व्यवहार विचार
सभी में परिवर्तन होता |
आशा

28 जून, 2013

सब यहीं छूट जाएगा


छोटी सी है जिन्दगी 
जी भर कर जी ले 
जो कुछ सही गलत किया 
आकलन उसका कर ले
है जीवन एक बुलबुला
किसी क्षण क्षय हो जाएगा 
यही सही समय है 
सारा हिसाब किताब करले 
जितने वायदे किये 
यदि पूरे न कर पाए 
अतिरिक्त बोझ मन पर होगा 
यदि बोझ रह गया 
यहाँ वहां मन भटकेगा 
होगा कठिन सहन करना 
 उससे मुक्त न हो पाएगा
ईश्वर से जब भेट होगी 
जबाब उसे भी देना होगा 
बंधन काट न पाया तो 
क्या मुंह उसे दिखाएगा 
इसी लिए बच मद मत्सर से
सारे बंधन छोड़ यहीं पर 
खुद को मुक्त कर ले 
जीवन तो क्षण भंगुर है
सब यहीं छूट जाएगा |
आशा

26 जून, 2013

कुछ अलग सा

इतने बड़े जहान  में
महफिलें सजी बहारों की
चहुओर चहलपहल रहती
उदासी कोसों दूर दीखती |
पर वह अकिंचन
मदमस्त मलय के प्रहार  से
 आहत एकल सिक्ता कण सा
बहुत असहज हो जाता |
चमक दमक देख कर
अवांछित तत्व सा
कौने में सिमटता जाता
अपना मन टटोलना चाहता  |
लगते न जाने क्यूं वहां
सभी रिश्ते आधे अधूरे
 सतही लगते
अपनेपन से दूर
 रोज बनते बिगड़ते |
बदले जाते कपड़ों से
दिखावे से ओतप्रोत होते
एक भी नहीं उतरता
 दिल की गहराई तक |
वह वहां दिखाई देता
मखमल में लगे
 टाट के पेबंद सा
दूर जाना चाहता
 उस अछूते कौने में
जो हो आडम्बर से परे
 भीड़ भाड़ से मुक्त
जहां कोइ अपना हो
टूट कर उसे चाहे
बाहें फैलाए खडा हो
उसे अपने में समेटने को
प्यार की भाषा समझे
छिपाले उसे अपने दिल में |

आशा






17 जून, 2013

आपसी बैर

आज एक बहुत पुरानी कहानी याद आई |दो बिल्ली कहीं से एक रोटी लाईं और खाने के लिए आपस में झगड़ने लगीं |एक बन्दर उनका झगड़ा देख  रहा था |
उसने कहा क्यूं झगड़ रही हो ?मेरे पास आओ मैं हिस्सा कर देता हूँ
बिल्ली ने रोटी बन्दर को दी |उसने रोटी के दो भाग  किये |जिसमें रोटी ज्यादा थी उसमें से रोटी तोड़ीऔर खा गया |हर बार वह रोटी तोड़ता और जो हिस्सा ज्यादा दीखता उसे खा जाता |धीरे धीरे वह पूरी रोटी खा गया और बिल्लियाँ
देखती ही रह गईं |दौनों की लड़ाई में तीसरे का भला हो गया वे ठगी सी  देखती ही रह गईं |देखिये यह कविता शायद अच्छी लगे :-
धर में चिराग आया 
स्वप्नों की बारिश हुई 
बढ़ते देर ना लगी 
आशा भी बढ़ने लगी 
स्कूल गए कॉलेज गए 
पर न्याय शिक्षा से ना किया 
लक्ष तक पहुँच नहीं पाए 
जैसे तैसे धरती को छुआ 
मस्तिष्क बहुत विचलित हुआ 
पढ़ा लिखा व्यर्थ गया 
राजनीति का भूत चढ़ा
गले गले तक पंक में डूबे
पहले जो कभी दोस्त हुआ करते थे 
अब आपस में  लड़ते झगड़ते 
एक दूसरे की काट करते 
भीतर घात  करते 
देश हित भूल कर 
केवल अपना घर भरते 
आम आदमीं ठगा गया 
खुद पर ही लज्जित हुआ 
कैसा नेता चुन लिया 
देश गर्त में डुबो दिया 
आपसी लड़ाई में 
देश खोखला किया
धर के चिराग ने ही 
आशियाना जला दिया |
आशा



15 जून, 2013

मेरे पापा

माँ की ममता पिता का प्यार
पर अंतर बड़ा दोनों में
ममता की मूरत दिखाई देती 
पर पिता का प्यार छिपा रहता 
दीखता केवल अनुशासन |
लगता था तब बहुत बुरा 
जब छोटी सी बात पर भी 
डांट ही मिलती थी
भूले से भी प्रशंसा नहीं 
जब खुद पिता बन गया हूँ 
बच्चों की उलझने सुलझा रहा हूँ 
तभी जान पाया हूँ 
वे कभी गलत  न थे 
यदि तब रोकटोक न होती 
आज में इतना सक्षम न होता 
रोज याद आती है उनकी 
उनके अनुशासित दुलार की 
अपने सर पर
 उनके वरद हस्त की 
अब सोचता हूँ 
 मेरे पापा  थे सबसे अच्छे 
उनसा कोई  नहीं |
आशा









14 जून, 2013

रुसवाई का सबब

आया था तुझसे मिलने
हालेदिल बयां करने 
उदासी में गुम तुझे देख
हुआ व्यस्त कारण खोजने में |
पर सच्चाई जब सामने आई
कोइ कदम उठा न सका 
तेरे ग़म में इतना मशगूल हुआ 
उसे अपना ही ग़म समझ बैठा |
सहारा आंसुओं का लिया 
पर वे भी कमतर होते गए 
जब एक भी शेष न रहा 
खुद से ही अदावत कर बैठा |
आंसू भी जब खुश्क हुए 
और मन की बात कह न सका
प्यार का इज़हार कर न सका 
रुसवाई का सबब बन बैठा |
आशा