25 जुलाई, 2021

प्रभु से मिली नियामत है


प्रभु से मिली  नियामत है

 भार नहीं   यह जिन्दगी  

है  झूलना इसे  जाने कब तक

 आशा निराशा के झूले में 

 लिए  मुस्कान चहरे पर |

कितनी भी कठिनाई हो

साहस  नहीं  खोना है

आँखों में  अश्रु सूख गए

 फिर भी रोना है |

जीवन का है  सत्य यही

किसी से छिपा नहीं है

हर बार की तरह इसे भी  

सपनों में  सजाना है |

  स्वप्न में और कल्पनाओं में

जीने का आनंद  है  कुछ और

 जो सच में है ही  नहीं

 उसे साकार  कराना है |

देखे कई  उतार चढ़ाव

  जीवन के समुन्दर   में

खेले खाए  हँसे हँसाए  रोए गाए

सभी इसी जीवन  में  |

आशा 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 आशा

24 जुलाई, 2021

चंचल हुआ


                                                                           
                                मनमोहिनी 

             देखी कंचन काया

आकृष्ट हुआ   

मन की आवाज  ने   

 उकसा कर  

हाल बेहाल किया  

किसी से पूंछा

ये पुष्प है कहाँ का

उत्तर आया

इस जहां का नहीं

चंचल हुआ   

किसी ने दी दस्तक

दरवाजे पे

पहचान हो गई

बरसों बाद

यूँही बैठे धूप में

जानना चाहा

कब मिले थे

वह भी भूली न थी

कहने लगी

जब से  देखा तभी

उत्तर सुन  

 मन  चंचल हुआ 

आशा

 

23 जुलाई, 2021

खोज सच्चे गुरू की


एक गुरू ऐसा चाहिए
कुछ सीखने के लिए
बिना ज्ञान मुक्ति नहीं होती
कहा हमारे बुजुर्गों ने |
पर गुरु कैसा हो
कितना गहराई में हो ज्ञान की
खोजना सरल नहीं
जिनने पाया सद्गुरू भाग्य के हैं धनी वही |
आज यही खोज होती कठिन
जाने कितने लोग लगाए बैठे हैं मुखौटा
अपने चहरे पर गुरू का
नाम डुबो रहे गुरू की महिमा का |
सब कुछ मिल जाता है
पर सच्चा गुरू नहीं मिलता सरलता से
जो मिलते हैं वे सद्गुरु नहीं
अधिकाँश हैं छलावा आज के परिवेश में |
अन्धविश्वासी न हो कर
गुरूदीक्षा लीजिए
गहन मनन कर के
खूब जान परख कर |
नमन उन सब गुरुओं को
जो सच्चाई का दामन थामें
उचित मार्ग दर्शन करते
देते हैं सही शिक्षा |
आशा


नया अंदाज



 



है चाँद सा मुखड़ा

चमक ऐसी

 चाँद आया  धरा पे   

 दीखती ऎसी

 खिले कमल जैसी

 सुडौल अप्सरा सी

कंचन देह

खंजन से  नयन

दृष्टि फिसली 

चहरे पर आव ऎसी  

न थमी दृष्टि   

 किया ऐसा सिंगार

चमका दिया 

चेहरा चांदनी सा 

आया निखार 

 नूरानी चहरे पे 

सजी  बालिका

नया  सा  अंदाज है | 

आशा 

 

22 जुलाई, 2021

मुक्तक


 

राज वही अंदाज वही

अल्फाज़ नहीं बयां करने को

मन मचल रहा सच कहने को

कैसे संवरण करूं प्रलोभान को

 |

मन चाहा चटपट पाया

 यही रहा सौभाग्य हमारा

जिसने की लालसा अधिक की

सब व्यर्थ हुआ ले न पाया

मन मसोस कर रह गया |

 

जब दिल के टुकडे हुए हजार

हर व्यक्ति ने पाना चाहा

भाग्यवान वही रहा

जिसने पाई न झलक उसकी |

 

गोरी गाँव की

 


श्यामल तन

 मुखरित आनन 

यही जीवन है

गोरी  गाँव  की

चलती ठुमके से   

जल भरने

राह में घिर आए

कजरारे से

बादल बरसते

बह घिरी वर्षा से

बरसा मेह

तरबतर किया

नहला दिया

उसको  व धरा को 

सध्यस्नाना   

खिली गुलाब जेसी 

मन को  भाई  

ललाट पर भीगी 

हवा के संग 

 लहराती काकुल 

मुखड़े पर 

चाद सा आकर्षण 

ले कर  आई  |

आशा 


 



21 जुलाई, 2021

चला आदित्य भ्रमण को

 सात अश्वों  के रथ पर  सवार

प्रातः चला आदित्य देशाटन को

राह के नजारे मन को ऐसे भाए

वहीं ठहरने का मन बनाया |

पर समय के साथ ठहर न पाया 

इस  युग की  देखी भागमभाग

 साथ सबके  दौड़ न पाया

कल दौड़ने  का वादा लिया खुद से   |

व्योम  पर जब दृष्टि  पडी

काले कजारे  बादलों ने घेरा उसे

सारी चमक दमक  लुप्त हो गई  

अन्धकार ने ऐसा  घेरा उसे |

  साथ रश्मियों ने भी  छोड़ा

अपने  वादे को  पूरा कर न सका  

उलझन बढ़ती गई घटाएं गहराने से

वह हारा बदल दिशा चल दिया अन्यत्र |

  सोचा उसने  कोई नई बात नहीं है

बाधाएं आती रहती हैं राह में

 किये बादों को पूरा करने में

सांझ  हुई वह  चल दिया अस्ताचल को |

आशा

 

 

 

 

 

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