09 दिसंबर, 2021

खुली किताब के सारे पन्ने


 

खुली किताब के सारे पन्ने

एक आदि ही पढ़ पाई

क्यूँ कि समय न था

मन मसोस कर रह गई |

जीवन का संग्राम

थमने का नाम नहीं लेता

मन उलझा उलझा रहता

 कितनी बातों को दर किनारे रखता |

कभी ख्याल मन में आता

किससे अपना कष्ट बांटूं

किसे अपना हम राज बनाऊँ

उसे कहीं खोजूं खोजती ही न रह जाऊं |

यूं तो जीवन है सुखी संपन्न

कोई कमीं नहीं मुझको

फिर भी यदि असंतुष्ट रहूँ

किसको दोष दूं |

यही फितरत मन की मुझे

कहीं की भी नहीं रहने नहीं देती

उलझी उलझी सी हैं जिन्दगी

ठीक से जीने नहीं देती |

आशा 

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07 दिसंबर, 2021

तुमहो चंचल चपल विद्युत जैसी

 


हो चंचल चपल

विद्युत की तरह

कभी शांत नहीं होतीं

तुमसे सब हारे |

अपने मन को

बहुत समझाया

पर वह न माना

क्या करती ?

बारम्बार तुमसे उलझता

कितनी बार प्रयत्न किये

पर सब व्यर्थ हुए

तुम्हें न बदलना था

न बदलीं किसी कौने से |

अपनी बातों पर

अडिग रहीं

ना कभी सुधरीं

सभी यत्न विफल रहे |

हार कर मैंने ही

मान ली हार 

अपनी बात मनवाने के लिए 

कदम पीछे हटा लिए |

पर मन में अवश्य

एक  विचार  आया

है व्यर्थ तुम जैसी 

अड़ियल से उलझना

 फिर खुद ही दुखी होना |

वही सलाह है सही   

अपनी राह पर चलो

किसी से मत उलझो

दाएं बाएँ मत देखो |

अब मुझे समझ आया

होगा क्या लाभ

आग से हाथ मिलाने से

खुद ही के हाथ जलाने से |

आशा 

06 दिसंबर, 2021

चाहत उड़ने की


 

चाहत उड़ने की

 उसे उत्साहित करती

तमन्ना होती जाग्रत

रात भर स्वप्न देखती |

 होते  रंगीन पंख तितली जैसे  

 आसपास लग जाते बाहों के

वह तितली सी उड़ना तो चाहती  

पर व्यवधान पसंद न आता उसे |

सारा आसमान हो उसका

कोई सांझा नहीं कर सकता

पर यह तो न्याय नहीं 

शेष सब कहाँ जाएंगे

यह नहीं सोचा उसने |

यही सोच उसका

 उड़ने में बाधक होता

जब भी कोशिश करती  

 कोई न कोई वहां होता |

वह मन मार कर रह जाती

उसकी चाहत

कभी  भी पूरी न हो पाती 

 सोच उसे कभी भी

आगे न आने देता

जहां खड़ी होती  थी

वहीं सिमट  कर रह जाती थी |

मन को झटका लगता

सोचती उसमें क्या कमी थी

जो उसे आगे न आने देती थी

 उसके पैर बाँध लेती थी |

दिल उदार होना चाहिए

केवल अपना ही सोचे दूसरों का नहीं

वह ईश्वर की नजरों से बच नहीं पाता

यही आगे बढ़ने में बाधक होता |

आशा 

हाइकु

 


जीवन गीत

मधुर है संगीत

प्यारा लगता

 

उदासी नहीं

प्रसन्न है चेहरा  

भला  लगता

 

सुरति नहीं

जाने कब देखी है 

तेरी  झलक


 

मन का मीत

प्यारा लगने लगा

मन में बसा

 

कहना क्या है

मन में बस गया

तेरा चेहरा

 

प्यार दुलार 

सभी स्थानों पर है

सोचा न था


शायरी लिखी 

गीत गजलें पढ़ी 

 तुष्टि न हुई  


 मन चाहता  

मोहक लगता है 

अर्ध रात्रि में

 

ख़याल  नेक

समझ आए यदि

होता आल्हाद


दूर सड़क

चमका है  आदित्य

भोर  बेला में  



    

आशा    

 

05 दिसंबर, 2021

कठिन होती अभिव्यक्ति


 

लिखने  होते जब कभी कई पत्र

 सोच सोच कर थक जाते थे

लिखना इतना होता था जटिल कि  

भाव शब्दों में व्यक्त न कर पाते थे |

भावों के जंगल में भटक जाते थे

मन की बातें  न कह पाते थे

 जब भी कोशिश करते थे लिखने की

समय मुठ्ठी से खसक जाता था |

समस्या यथावत रह जाती थी

हार कर नक़ल के लिए

किसी  पुस्तक का सहारा लेते थे

नक़ल से  भी संतुष्टि न मिलाती थी |

तब  किसी मित्र से लिखवाते थे

उसकी बैसाखी का सहारा लेते थे

पर यह भी उचित नहीं लगता था

यह सोच मन को कष्ट देता था |

विचार मेरे व शब्द किसी और के

मन को संतुष्ट न कर पाते थे

यथासंभव कोशिश करते रहने से

 सफलता तो मिली भावों की अभिव्यक्ति में |

मन का मोर नाचने लगा

 मन के विचार स्पष्ट करने  में

 सफलता की कोशिश ही रंग लाई

  प्रयत्नों के बाद भाषा को सजाने सवारने में |

आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

04 दिसंबर, 2021

जलवा तुम्हारा


  

रूप रंग स्वभाव तुम्हारा  

 जलवा तुम जैसा  

 है ही  ऐसा

हो तुम  सब से  जुदा |

तुम्हारा मन किसी से

 मेल नहीं खाता

देख कर किसी को भी

 अंतरमुखी हो जाता |

सब चाहते तुमसे 

मिलना जुलना बातें करना

पर तुम्हें है  पसंद

 गुमसुम रहना |

भूले से यदि मुस्कुराईं

मन को भी भय  होता

 यह बदलाव कैसा 

 यह क्या हुआ ?

हो गुमसुम गुड़िया जैसी  

कोई समस्या नहीं तुम में 

 तुम्हारा स्वभाव है जन्म जात  या

 परिस्थिति वश मालूम नहीं |

तुम्हें समझना है कठिन

सहज कार्य नहीं है 

बोलने में हो कंजूस पर

 मुस्कुराने में कमी नहीं |

जो भी देखता एकटक तुम्हें 

पलकें तक नहीं झपकतीं 

देखता ही रह जाता 

 अनुपम आकर्षण तुम्हारा | 

तुम हो लाखों में एक

 हो गुण सम्पन्न इतनी   

किसी से कम नहीं हो 

एक झलक ही  तुम्हारी है अनुपम |

आशा 

03 दिसंबर, 2021

हिन्दी भाषा की अधोगति


 

पत्र लेखन कितना कठिन था

 पहले कभी समस्या न थी 

अब तो यह भी भूल गए

संबोधन किसे कैसे करें |

जब से दूर भाष यंत्र का

प्रयोग हुआ प्रारम्भ

लिखने की गति भी  

बाधित हुई है |   

यह कठिनाई बढ़ती गई     

 जब परीक्षा में पत्र लिखना होता  

मुश्किल से पांच अंकों में से

  दो अंक ही प्राप्त होते है |

अब तो “u” से ही काम चल जाता है

“you” के स्थान  पर 

पूरा नाम क्यों लिखें जब

दस्तखत से ही काम चले |

लिखने से बचने के लिए

कई साधन हैं उपलब्ध अब

लगने लगा है अब तो

  लिपि भी कहीं खो जाए ना |

अक्षर आँखों के आगे

 गोल गोल घूमेंगे

फिर भी समझ में न आएगा

 क्या लिखना चाहा और क्या लिखा है |

सुन्दर और शुद्ध लेखन कल्पना में

रह  गया है केवल

कोई अहमियत नहीं रही उसकी 

शिक्षा सतही हो गई है |

भाषा का अधोपतन

 और कितना होगा

खिचड़ी भाषा बोलने में

कोई शर्म नहीं आती |

यह शान की बात होती है कि

 प्रत्येक वाक्य में

आधी अंग्रेजी आधी हिन्दी

 बोली जाती है |

भाषा की शुद्धता की  क्या बात करें  

 भाषा में मिलावट दाल में कंकड़ सी हुई 

मन का संताप नहीं मिटता 

यह हाल भाषा का देख |

बड़ी बड़ी बातें की जाती 

भाषा के अधोपतन की

उससे बचने के लिए उन्नति के लिए

भाषा की  प्रगति के लिए |

आशा