06 जून, 2022

मुक्तावली

 

शब्दों को चुन कर 

 सहेजा एकत्र किया

प्रेम के धागे में पिरो कर 

 माला बनाई प्यार से 

सौरभ से स्निग्ध किया

खुशबू फैली सारे परिसर में |

 धोया साहित्यिक विधा के जल से 

  

अलंकारों से सजाया

मन से अद्भुद श्रृंगार किया

फिर तुम्हें  पहनाया 

उसे दिल से |

एक अद्भुद एहसास जागा मन में

हुई मगन तुममें

 दीन दुनिया भूली

क्या तुम ने अनुभव

 न किया यह दीवानापन

या जान कर भी अनजान रहे |

यह तो किसी प्रकार का न्याय नहीं

ना ही थी ऎसी अपेक्षा तुमसे

मन को दारुण दुःख हुआ

क्या कोई कमी रही 

मेरे प्रयत्नों में|

यदि थोड़ा सा इशारा  किया होता

मुझे यह अवमानना

 न सहनी पड़ती

मेरी भावनाएं 

 तुम्हारे कदमों में होती|

मुक्तावली की शोभा

 होती तुम्हारे कंठ में |

तुम हो आराध्य मेरे 

यही है पर्याप्त मेरे लिए  

कभी न कभी तो मेरी

 फरियाद सुनोगे |

मुझे किसी से नहीं बांटना तुम्हें

तुम मेरे हो मेरे ही रहोगे |

04 जून, 2022

वर्तमान मेरा


 

मेरी आस्था

 तुम्हारा वरद हस्त

यही पाया है मैंने 

बड़े प्रयत्नों से |

सफलता भी पाई है इसमें

किन्तु एक सीमा तक 

ब भी चाहा  वही पाया

मैंने बिना किसी बाधा के

फिर भी संतुष्टि नहीं मिल् पाई

न जाने कहाँ  कमी रही अरदास में |

मन को टटोला आत्ममंथन किया

फिर भी तुमसे दूरी रही

 यह हुआ कैसे

कोई सुराग न मिला

 सोच में डूबी रही

मन में विद्रूप हुआ 

कहाँ भूल हुई खोज न पाई |

यही उलझने 

मुझे सताती रहीं

 कोई निराकरण

 नहीं निकला |

मुझे तरसाता रहा 

रहने लगी उदास

 थकी थकी सी 

जीवन बेरंग हुआ |

अब चाह नहीं 

और जीने की

 मन बुझा बुझा सा रहा 

है यही वर्तमान मेरा |

आशा   

01 जून, 2022

मंजिलें मिले न मिलें


 

                मंजिलें मिले न मिलें

यह अलग बात है

कोशिश में कमी हो

यह तो सही नहीं  |

प्रयत्न इतने हों जब

दूरी कभी तो कम हो

है यही गंतव्य मेरा

उस तक पहुँच पाने का |

सफलता पाने के लिए

वहां तक पहुँचाने के लिए

दिन रात कम पड़ जाएं

पर हार का मोंह न देखूं |

यही है अरदास तुमसे

मेरा मनोबल न कम हो

जिससे हो लगाव गहरा

 वही पास हो मेरे |

मेरी चाहत है यही

और उद्देश्य मेरा यही

बस वहां तक पहुंचूं

यह है अधिकार मेरा |

दृढ संकल्प पाने के लिए

हर कार्य में सफल रहूँ

यही आशीष देनी मुझे

 मनोबल मेरा  बढ़ाना

यही है आश मेरी |

31 मई, 2022

जीवन जीने की कला


 


माना तुम हो हसीन

 किसी से कम नहीं

पर यह खूबसूरती जाने कब बीत जाएगी

यह भी तो पता नहीं |

 तुम सोचती ही रह जाओगी  

जब दर्पण में अपना बदला हुआ रूप देखोगी

मन को बड़ा झटका लगेगा   

कहाँ गया  यह  रूप योवन  

जान तक न पाओगी |

एक दिन तो बुढापा आना ही है

कोई न बच पाया इससे

तुम यह भी न  जान पाओगी |

योवन तो क्षणिक होता है

कब आता है जीवन से विदा हो जाता है

कुछ दिन ही टिक पाता है |

यही हाल है बचपन का

जीवन में ये दिन बड़ी मस्ती के होते हैं

कई बातें तो भूल भी जाते हैं

 पर जितनी यादे रह जाती है

ताउम्र बनी रहतीं है

 यादों की धरोहर में सिमट कर 

जीवन का रंगीन पहलू दिखाई देता है उनमें |  सबसे कठिन  है वृद्धावस्था में जीवन व्यापन  

अपने को जीवित समझना उसके अनुकूल ही समझते रहना सदा खुश रहना

मन में किसी को झांकने न देना

अपने दुःख सुख किसी से न बांटना

यही है इस काल में जीने की कला | 

आशा  


28 मई, 2022

सम्मान मिले न मिले



कभी भूल कर भी

 न जाना उस ओर

जहां नहीं मिलता सम्मान

यह भी जान लो |

सम्मान माँगा नहीं जाता

स्वयं के गुण ही उसे पा लेते  

वे जहां से गुजरते

 वह बिछ बिछ जाते |

मन को अपार प्रसन्नता होती

जब बिना मांगे 

चाहा गया मिल जाता

समाज में सर उन्नत होता |

यही प्रतिष्ठा की अभिलाषा रहती

आत्म सम्मान ही धरोहर होती

या यूं कहें संचित धन राशि होती

जिसके लिए रहना दूर  पड़ता

 गलत आचरण से  |

आशा 


आशा 

25 मई, 2022

किसी से कुछ न चाहिए

 

मुझ को कुछ न चाहिए

 सब  मिला है भाग्य से |

 और कुछ न चाहिए 


किसने कहा कि मैं हूँ अक्षम     

मैं भी हूँ सक्षम हर कार्य में

पहाड़ हिला  सकती हूँ

आज की नारी हूँ

किसी से कम नहीं हूँ  |

ऊंची उड़ान हँ ध्येय मेरा

उसमें सफल रहूँ

 हार का मुह न देखूं

बस रहा यही अरमान मेरा |

यदि सफलता पाई

जीवन में आगे बढूंगी 

जीत लूंगी सारा जग 

पलट कर पीछे न देखूंगी |

आशा 

20 मई, 2022

यादों का पिटारा




 

बरसों बरस होती

संचय की आदत सब में

यादों के रूप में

यही मेरे साथ हुआ है |

पुरानी यादों को

बहुत सहेज कर रखा है

अपनी यादों के पिटारे में

यह पिटारा जब भी खोलती हूँ

बहती  जाती हूँ

विचारों के समुन्दर में|

इससे जो सुख

दुःख  मुझे मिलता 

है इतना अनमोल कि

उसको किसी से बांटने का

मन नहीं  होता  |

बचपन की मीठी यादे मुझे ले जाती उस बीते कल में

वे लम्हे कब बीत गए

पिटारा भरने लगा |

जब योवन में कदम रखा

  समस्याओं से घिरी रही

 वे दिन भी यादों में ताजे है |

धीरे से समय कब बीता

जीवन में आया स्थाईत्व

सब याद रहा एक तस्वीर सा

अब बानप्रस्थ की बारी आई |

  जिम्मेंदारी में उलझी

एक एक लम्हां कैसे कटा

सब है याद मुझे  |

जीवन की संध्या में यही माया मोह

 मेरा पीछ नहीं छोड़ता कैसे दुनियादारी से बचूं |

कीं जैसे ही ऊंची उड़ान की कल्पना  

 मन के पंख कटे  

ठोस धरातल पर आई |  

आस्था की ओर कुछ  झुकाव हुआ है

यही है सार मनोभावों का जो मैंने छिपाए रखा है

यादों के पिटारे में  |

आशा