18 अगस्त, 2022

मुझे प्यार है तुमसे










































मुझे प्यार है तुमसे तुम मानों या न मानो 

कोई दिल्लगी नहीं है कोई दिखावा नहीं है 

मैंने सच्चे दिल से प्यार किया था तुमसे 

तुमने मुझे जाना नहीं पहचान हुई जब तुम से |

तुम पहचानो या  मुझे भूल जाओ 

पर मेरे मन में गहराई से छिपा है  प्यार तुम्हारा 

शब्दों की दरकार नहीं है उसे किसी को समझाने में |

मुझे आवश्यकता  नहीं खुद की उपस्थिति की  

तुम्हारे दिल में जगह बनाने में 

 सच्चा हो या दिखावा मात्र  तो प्यार ही है नही कोई छलावा 

जब दिल में  आग लगी हो दोनों ओर बराबरी से 

कोई आवश्यकता नहीं होती किसी प्रमाणपत्र की  |

जो जैसा मन का भाव रखेगा वैसा ही फल पाएगा 

स्वच्छ मन को  धोखा न मिलेगा यही सब सुना मैंने |

 मन भटकता नहीं  मेरा  आत्म विश्वास  प्रवल है 

ईश्वर से लगाव मुझे है कभी कोई न कदम भटकैगा 

कभी प्यार का  चिराग जलाने का 

प्यार भरा  वादा किया है खुद से मैंने 

उसका क्या महत्व है मेरे जीवन में 

यही बात बता कर मन को बहकाया है |

आशा सक्सेना 




 


17 अगस्त, 2022

मन कडवाहट से भरा

 जलने लगा हर

 श्वास  का कण कण 

तब भी ज़रा भी

 स्वर नहीं हुआ मध्यम 

किसी के पास आते ही

 गात में हुआ कम्पन 

एक झुर झुरी सी आई 

मुंह का स्वाद हुआ कटूतर |

कभी सोचा न था

 यह क्या हुआ

 कब तक ठीक होगा |

दवाई ने मुंह का स्वाद 

बहुत बर्वाद किया 

कभी दया नहीं पाली 

मन  बहुत अशांत हुआ |

दिनभर ड्रिप लगी रही 

फिर भी मन स्थिर न रहा 

बहुत  बेचैनी बढ़ती गई |

बस   एक अरदास बची थी

उससे  कुछ राहत मिली थी 

पर तब भी पूरी राहत न मिली 

फिर भी जब तक ठीक न हो पाऊँ 

जिसे करने से कुछ राहत मिली

 और अधिक जब स्वस्थ हो जाऊं  

तेरे ही गुणगान करूं 

नित गुरु  ग्रन्थ साहब   का पाठ  करूं  |

आशा सक्सेना 

 


16 अगस्त, 2022

माया जाग्रत हुई

 आज के युग में

 इसी दुनिया में 

हमने संसार से बहुत कुछ सीखा 

छल छिद् से  न  बच पाए 

ना ही कुछ सीखा 

ना ही कुछ बन पाए |

माया नगरी में ऐसे फंसे  

कदम तक उखड़ गए 

बहुत खोजना चाहा 

 राह में ऐसे भटके

 सोचा क्यूँ न जल मार्ग से 

मार्ग पार कर लूँगा सहज ही 

पर मझधार में नैया

 हिचकोले लेने लगी 

हम मार्ग में भटके |

प्रभु से की प्रार्थना 

हे परमात्मा हमें 

सद मार्ग की शिक्षा देना 

जिससे खुद सही मार्ग को चुने 

 ईश्वर को कभी न भूलें 

यही सब को दे सलाह

 सद मार्ग पर चलें |

आशा सक्सेना 


मैंने बहुत कुछ सीखा

 मैंने  बहुत  कुछ सीखा 

न सीखी होशियारी 

नाही कुछ हसीं ख्याव देखे 

ना ही जीवन रूमानी |

किसी से कुछ भी न सीखना चाहा 

सोचा अधिक सीख कर क्या होगा 

अपच ही हो जाएगा 

धीरे से यदि सब सीखा 

कुछ अधिक उजाला लाएगा |

जाने कितने संकल्प किये 

कितनों की सहायता की 

कितनों की निगहवानी की 

तब भी कोई यश न मिला 

जान  कर भी कुछ न मिला | 

हर निराशा  में आशा  पाई 

आगे जाने की उम्मीद जगाई

तभी यह अरमान जाग्रत हुए  

हम सब कर सकते हैं |

आशा सक्सेना 

13 अगस्त, 2022

राखी निकली गहन उदासी में



राखी निकली गहन उदासी में 

घर था खाली खाली कोई न आया 

आता भी कैसे अन्य देश का वासी हुआ 

माँ थी जब धूम धाम से बड़े उत्साह से 

सब त्यौहार मनाए जाते थे |

अब ना तो  माँ रहीं नहीं भाई बहिन

 हुए अपने अपने में व्यस्त सब 

समय का किसी को भान न हुआ  |

सारा दिन कटता उनके इन्तजार में 

फिर भी बहिन का मन नहीं मानता 

देखती रहती द्वार पर 

जब भी दरवाजे पर आहाट होती 

वह  चौक जाती शायद भाई ने दी दस्तक |

फिर भी शगुन के कच्चे धागे 

कलाई पर कैसे न बंधते 

मन को संतोष मिल जाता है 

कान्हां को राखी बांधकर ही |

आशा 






तिरंगा


हमारा तिरंगा लगता है हम को 
सबसे न्यारा  सब से दुलारा 
है हमारी आन  बान  शान का प्रतीक  सब से प्यारा 
पन्द्रह अगस्त पर 
लाल किले की प्राचीर से 
फहराया जाता बड़े सम्मान से इसे 
प्रधान मंत्री के द्वारा 
राष्ट्र ध्वज है नाम इसका 
तीन  रंगों से बना है 
ऊपर से भगवा रंग 
बलिदान का यह प्रतीक है 
मध्य में श्वेत रंग का 
सच्चाई का प्रतीक 
नीचे होता हरा रंग 
है धनधान्य से सम्पन्न देश 
मध्य में चौबीस शलाकाओं का बना एक चक्र 
जिसे कहते अशोक चक्र 
तिरंगे पर अपार गर्व होता 
चाह यही है दिलसे अपने 
राष्ट्रधज का   हो सम्मान सदा   
कभी इसे न झुकने दे
देश के पति निष्ठा रखें 
   प्रगरी  शील है देश हमारा
कर्तव्यों को कभी न भूलें 
देश के लिए बलिदान करें  |  
जय हिन्द का उद्घोष क
आओ जनमान गण का गान करें |
आशा लता सक्सेना 



11 अगस्त, 2022

बरसात का आलम

उमढ घुमड़ जब बादल आए 

 वायु जब मंद मंद चले महकाए 

मेरे बदन में सिहरन  सी दौड़े 

एक अनोखा सा एहसास हो 

जो छू जाये  तन मन को  |

कभी लगाने लगता है 

आगन में दौडूँ या खेलूँ घूम मचाऊँ 

पूरी ताकत से गीत गाऊँ गुनगुनाऊँ 

बचपन के  आने का एहसास करा के 

माँ के आँचल का एहसास  कराऊँ 

मा का एहसास  करा कर  निमंत्रण दूं 

तुम्हेंअपने पास आने का 

इस माँ ने ही झूले में झुलाया था 

गोदी में प्यार से सुलाया था 

जब भी जिद्द पर आई 

बहुत धेर्य से माँ  ने समझाया था  |                     \

जब से  मैं बड़ी हो गई हूँ 

चाहे जब डाट कहानी पढती है  

फिर भी जग की रीत निभानी पड़ती है 

अब मन मानी नहीं चल पात

पर माँ की बहुत याद आती  है  |

इसबार मुझे माँ छोड़ गई है 

भाई ने भी मुख मोड़ लिया है 

है  अव घे घर खाली खाली वीरान सा 

 कान्हां के सिवाय किसे राखी बांधू |


आशा