09 मई, 2012

आँखें नम ना करना


निकली जो आहें  दिल से
पहुंचे यदि तुम तक मत  सुनना
मेरे दिल सा तुम्हारा दिल भी टूटे ना
तपती धूप में भी 
तुम्हारे पैर कभी जलें ना
अंधकार में भी भय तुम्हें हो ना
सुकून तुम्हें  ना दे पाऊँ 
ऐसा  कभी हो ना
मेरे जैसा सोच तुम्हारा
 निराशा लिए हो ना
रात्रि में साम्राज्य 
अनिद्रा का कभी हो ना
छू ना पाए कभी उदासी
कांटे भी दामन तुम्हारा
 छू पाएं  ना
झूटी कसमें झूठे वादों का 
भरम तुम्हे हो ना
करना ना स्वीकार 
कभी ऐसा  बंधन
जो स्वीकार्य तुम्हें हो ना
 कारण मेरी उदासी का खोजना ना
जान भी लो तो कभी
 सच मानना ना
 रख के दूर उसे खुद से 
नृत्य देखना मोर का
पर उसके आंसुओं पर जाना ना
उसके पैरों में
 पायल हैं या नहीं
या कहीं गुम हो गईं सोचना ना
कोयल सी कुहुकती रहना
वन उपवन महकाना
दुःख के सागर में खो
 आँखें नम ना करना |
आशा 

06 मई, 2012

महिमा अति की

रसना रस में पगी 
शब्दों में मिठास घुली 
आल्हादित मन कर गयी 
सुफल सकारथ कर गयी
पर अति मिठास से 
कानों में जब मिश्री घुली 
हुआ संशय मन में
पीछे  से कोई वार न कर जाए 
अति मिठास कडवी लगी 
दरारें दिल में दिखीं 
तभी जान पाए 
महिमा अति की |
सच  ही कहा था किसी ने
"अति सर्वत्र वर्ज्यते"
पर तब केवल पढ़ा था
आज उसे देख पाए |
आशा


04 मई, 2012

बंधन

 
 ये  घुंघरू बंधन  पैरों के
 ना पहले बजे ना आज
डाले गए  पायलों में
फिर भी बेआवाज
हें ना जाने क्यूँ मौन ?
शायद इसलिए कि
पहनने वाली भी रहती मौन
भाग्य सराहा जाता उसका
होती चर्चा रूप की
सजे पैर पायलों से
यूँ तो आकर्षित करते
घुँघरू तब भी रहते मौन
कोई नहीं जानता
मुराद उसके मन की
रहती सदा अपूर्ण
निराशा ने डेरा डाला
उदासी से पड़ा पाला
 है परकटे पक्षी सी
कैद चार दीवारी में
उड़ नहीं सकती
 है परतंत्र  इतनी
मन की कह नहीं सकती
सोच नहीं पाती
 घर के बाहर भी
 है एक और  जहाँ
ग़मों के अलावा भी
 हैं खुशियाँ वहाँ
 प्रारब्ध का यह खेल कैसा
या फल अनजाने कर्मों का
सब को  सहन करना
आदत सी हो गयी है
ओढ़े आवरण दिखावे का
दिन तो कट ही जाते हैं
है यह कैसा बंधन
लोग ऐसे भी जी लेते हैं |
asha 



30 अप्रैल, 2012

जो मैं भी समझ ना पाया

मनचाहा कह ना पाया 
जो कहा हो ना पाया 
जो भी हुआ 
पचा  ना पाया 
हुए  विद्रोह के स्वर प्रस्फुटित 
वे सारे वार भी 
झेल  ना पाया
किसी ने   मेरा
साथ ना दिया 
सिरे से नकार दिया 
तब धीरे से 
अनकही बातें मन की 
उजागर होने लगीं 
लोगों की समझ से परे 
कई विचार 
उलझे से उपजे 
अन्तर्निहित रहस्य तब भी 
प्रगट नहीं कर पाया 
गहन चिंतन  में खोया 
अपने में सिमट गया 
सार नहीं जब कोई निकला 
अंतर्मुखी हो गया 
लोगों का जब ध्यान गया 
उन सारी बातों पर सोचा 
किसी हद तक उन्हें समझा 
जो मैं भी ना  समझ पाया |
आशा



28 अप्रैल, 2012

बांसुरी

प्राण फूंके कान्हां ने 
बांस की पुगलिया में
बाँसुरी बन कर बजी
ब्रज मंडल की गलियों में
अधरामृत से कान्हां के
 स्वर मधुर उसके हुए
गुंजित हुए सराहे गए
कोई सानी  नहीं उनकी
गोपियाँ खींची चली आतीं
उसकी स्वर लहरी पर
सुधबुध खो रास रचातीं
कान्हां पर बलि बलि जातीं
जमुना तट पर कदम तले
मोह देख कान्हा का
उस बांस की पोंगली से
राधा  जली ईर्ष्या से भरी
बरजोरी की कन्हैया से
छीना उसे और छिपा आई
हाथ जोड़ मिन्नत करवाई
तभी बांसुरी लौटाई
उसे देख कान्हां के संग
ईर्ष्या कम ना हो पाई
वह सौतन सी  नजर आई |
आशा 





25 अप्रैल, 2012

लीन विचारों में




कुछ उलझे से लीन विचारों में
  गर्दन नीची कर बढ़ते
भेड़ों के झुण्ड में जाती एक भेड़ से
चरते सूखी घास पीछे मुड़ नहीं पाते
 सोच  समझ भी खो देते
 उस भेड़ चाल में
 हो  विद्रोही सहनशीलता तज देते
 पर  कभी मेमने के स्वर से
कानों में मिश्री घोलते
अस्थिरता मन की बढ़ती जाती
सुख शान्ति चैन  सब हर लेती 
कुंद बुद्धि होती जाती
जाने वह दिन कब होगा
समृद्धि की बयार बहेगी
जिंदगी सही पटरी पर होगी
लेखनी अवरूद्ध ना होगी
हैं जाने कैसे लोग
कथनी और करनी की
खाई पाट  नहीं पाते
लिखते हैं बहुत कुछ
पर मनोभाव तक पढ़ न पाते
सीमा साहित्य की छू नहीं पाते
नया सोच नई विधाएं अपनाते
क्या बदलाव ला पाएंगे
दर्पण समाज का बन पाएंगे
विष बेल विषमता की
समूल नष्ट कर पाएंगे
जाने कब परिवर्तन होगा
भेड़ चाल से पा छुटकारा
लिखने की स्वतंत्रता होगी
वर्तनी समाज का दर्पण होगी |
आशा


22 अप्रैल, 2012

उसे क्या कहें

मखमली दुर्वा को गलीचा समझ 
की अटखेलियाँ किरणों से 
फिर भी गहरी उदासी से 
मुक्ति ना मिल पाई 
निहारता दूर क्षितिज में
नेत्र बंद से होने लगते 
 खो जाता दिवा स्वप्न में 
सत्य से बहुत दूर 
नहीं चाहता कोई कुछ कहे 
है वह क्या ?आइना दिखाए 
कठिनाइयों से भेट कराए 
भूले से यदि हो सामना 
निगाहें चुराए मिलना ना चाहे
या फिर आक्रामक रुख अपनाए 
कैसे  बीता कल भूल गया 
ना ही चाहता जाने 
होगा क्या कल 
प्रत्यक्ष से भी दूर भागता 
ऐसे ही जीना वह चाहता 
उसे क्या कहें |
आशा


14 अप्रैल, 2012

सौगात कुशलता की

गीली मिट्टी घूमता चाक 
आकार देते सुघड हाथ 
आकृतियाँ जन्म लेतीं 
हरबार नया आभास देतीं 
संकेत होता वही 
हाथों की कुशलता का
मनोंभावों की पूर्णता का 
यदि कहीं कमीं रहती 
मानक पर खरी नहीं उतरती 
वह  सहन नहीं होती 
नष्ट करदी जाती 
मिट्टी  मिट्टी में मिल जाती 
ब्रह्मा ने सृष्टि रची होगी 
ऐसे ही किसी चाक पर 
निर्मित हुईं कई कृतियाँ 
भिन्न भिन्न आकार लिए 
हर आकृति कुछ भाव लिए 
समानता होते हुए भी 
स्व का भाव लिए 
है  जाने क्या ऐसी माया 
दिखने में सभी एक जैसे 
फिर भी होते अलग से 
चाक निरंतर चलता रहता 
वही मिट्टी वही रण 
वही बनाने का ढंग 
फिरभी यह विभिन्नता 
लगती सौगात  कुशलता की
मन में उठते भावो की 
उनकी सजीव अभिव्यक्ति की
आशा






09 अप्रैल, 2012

जिंदगी को भरपूर जिया है


मैंने जिंदगी को
कई कोणों से देखा है
हर कोण है विशिष्ट
हर रंग निराला है
होता जीने का अंदाज
गहराई लिए
तो कभी अहसास
केवल सतहीपन का
दे जाता बहुत कुछ
जो होता दूर
हर व्यक्ति की पहुँच से
दीखता उस रस्सी सा
जिस तक पहुँचना नहीं सरल
पर उसी रस्सी पर नट को
बिना सहारे चलते देखा है
मैंने जिंदगी को करीबसे देखा है
यह है वृत्त बहुआयामी
उन सभी आयामों को
महसूस किया है
दी है अपनीप्रतिक्रिया भी
कोसों दूरअतिशयोक्ति से
पास बहुत सत्य के
उसी सत्य को आकार दे
प्यार में डूबे देखा है
जिंदगी जीने की कला
सीखने की चाहत को
संबल मिलते देखा है
जिंदगी को जिया है
भोगा है महसूस किया है
हर कोण की छुअन को
उन अनुभूतियों को
यादों में समेटा है
मैंने जिंदगी को भरपूर जिया है |
आशा


08 अप्रैल, 2012

पुस्तक समीक्षा "अनकहा सच "

डा.राम सिंह यादव द्वारा लिखी गयी :-
प्रेम  चिंतन और सकारात्मक सोच की छन्द मुक्त भेट -अनकहा सच
व्यक्तित्व के ना ना रूपों के कारण अभिव्यक्ति भी अलग अलग होती है |सहृदय व्यक्तित्व शब्द रूपी कूची से अनुभूति को उकेरता चला जाता है यह अभिव्यक्ति उसकी सृजनशीलता कहलाती है |लेकिन सवाल उठता है कि आखिर सर्जना के लिए कैसी अनुभूति चाहिये ?इसका सब से श्रेष्ठ जवाब श्री मती आशा सक्सेना ने "अनकहा सच "में बेहतर तरीके से दिया है |अपने ६९ बे वसंत पर जीवन की अनुभूतियाँ ,भावों की अभिव्यक्ति की छंद मुक्त भेट "अनकहा सच "में दी है |कहा जाए तो  कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी इस छंद मुक्त उपहार में प्रेम ,चिंतन, पर्यावरण ,प्रकृति ,धर्म ,आध्यात्म ,आदि सभी कुछ समाया है |इनके धैर्य ,साहस और ऊर्जा की जितनी प्रशंसा की जाए कम है |इस उम्र में एक जिम्मेदार नारी के सारे कर्तव्य पूर्ण करने के बाद इस प्रकार की काव्य रचना काबिले तारीफ है |
जीवन रूपी रंग मंच पर सब कुछ अभिनय करने के बाद भी कुछ अनकहा सच रह ही जाता है |कवियत्री ने अपना अनकहा सच कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है -
दो बोल प्यार के बोले होते /पाते निकट अपने
नए सपने नयनों में पलते/ना रहा होता कुछ भी अनकहा |
यदि अपने मन को टटोला होता चाहत की तपिश कभी समाप्त नहीं होती -
अपनी चाहत को तुम कैसे झुटला पाओगे
मेरी चाहत की ऊंचाई ना छू पाओगे कभी 
खुद ही झुलसते जाओगे उस आग की तपिश में |
उम्र  के आखिती पड़ाव पर यदि अपनों का साथ ना हो तो मन दुखी हो जाता है |मन में कसक गहरी होती है-
होती  है कसक
जब कोई साथ नहीं देता 
उम्र के इस मोड़ पर
 नहीं होता चलना सरल 
लंबी कतार उलझनों की 
पार पाना नहीं सहज |
अपने अतीत को कोई भला भुला पाया है अतीत पर यह देखिये -
जाने कहाँ खो गया 
दूर हो गया बहुत 
जब तक लौट कर आएगा 
बहुत देर होजाएगी 
ना पहचान पाएगा मुझे कैसे |
'प्रतिमा सौंदर्य की ' कविता महाप्राण सूर्य कान्त त्रिपाठी की कविता "वह तोडती पत्थर "की याद ताजा कर देती है |  एक मजदूर स्त्री के प्रति सौन्दर्यानुभूति भाव को बखूबी प्रकट किया है -
प्रातः से संध्या तक वह तोड़ती पत्थर 
भरी धूप में भी नहीं रुकती
गति उसके हाथों की |
जीवन की क्षण भंगुरता उन्हें "सूखी डाली "में दिखाई देती है -
एक दिन काटी जाएगी 
उसकी जीवन लीला 
हो जाएगी समाप्त
सोचती हूँ और कहानी क्या होगी 
इस क्षणभंगुर जीवन की  ?
मैं कुछ लिखना चाहती हूँ कविता अनकहा सच की आत्मा है |कहाजाए तो कुछ अतिशयोक्ति नहीं होगी -
अब मैं  लिखना चाहती हूँ 
आने वाली पीढ़ी के लिए 
मैं क्रान्तिकारी  तो नहीं
 पर सम्यक क्रान्ति चाहती हूँ
हूँ एक बुद्धिजीवी 
चाहती हूँ प्रगति देश की 
"एक  झलक "कविता हमारे देश की आत्मीन्य्ता ,प्रेम और एकता की ओअर इशारा करती है -
इतना प्यार तुम्हें मिलेगा 
डूब जाओगे अपनेपन में 
गर्व करोगे अतिथि हो कर 
और जब बापिस जाओगे 
फिर से लौटना चाहोगे 
बार बार इस देश में |
मृत्यु एक शाश्वत सत्य है -जो जन्मा है मृत्यु को अवश्य प्राप्त होता है -
होती अजर अमर आत्मा 
है स्वतंत्र जीवन उसका 
नष्ट कभी नहीं होता
शरीर नश्वर है 
जन्म है प्रारम्भ 
मृत्यु है अंत उसका |
"कुछ ना कुछ सीख देती है"रचना जीवन में उत्साह -ऊर्जा का संचार करने वाली आशा वादी रचना है -
सूरज  की प्रथम किरण 
भरती जीवन ऊर्जा से
कल कल बहता जल
सिखाता सतत आगे बढ़ना |
प्रत्येक  व्यक्ति का जीवन एक डायरी की तरह है  जिसमें अंकित होती हैं सुख -दुःख ,यादों की खट्टी मीठी बातें 
डायरी का हर पन्ना कोई मिटा नहीं सकता क्यों कि -
पेन्सिल से जो भी लिखा था 
रबर से मिट भी गया 
पर मन के पन्नों पर जो अंकित
उसे मिटाऊँ कैसे ?
प्रेम से ही दुनिया चलती है सबसे अच्छा प्रेम वही है जिसमें त्यागहै ,
विश्वास है ,समर्पण है |"प्रेम  ही जीवन है "में शायद कवियित्री यही कहना चाहती हैं -
इधर उधर भटकते हो 
सुकून कहाँ से पाओगे ? 
होता जीवन क्षण भंगुर
 बिना प्रेम अधूरा है |
श्री मती आशा लता सक्सेना को उनके स्वान्तःसुखाय -भाव समर्पण के लिए साधुवाद |"अनकहा सच "की एक खास विशेषता जो मैं कहना चाहूँगा कि इस काव्य संकलन की सारी कवितायेँ सरल,सरस ,और प्रवाहमय हैं |कविताओं में व्यर्थ के रूपक गढ़ने की कोशिश नहीं की गयी है |लयात्मकता कविता को बार बार पद्गने को बाध्य 
करती है| पुनःसरस ,पठनीय ,प्रवाहमय काव्य संकलन के लिए हार्दिक बधाई |समग्र रूप से आपकी कवितायेँ मन को प्रभावित करती हैं |










01 अप्रैल, 2012

झीना आवरण


वे व्यस्त नजर आते 
जीवन की आपाधापी मे 
अभ्यस्त  नजर आते 
मनोभाव छिपाने में 
आवरण से ढके 
सत्य स्वीकारते नहीं 
झूट हजारों के
सत्य स्वीकारते नहीं
हर वार से बचना चाहते
ढाल साथ रखते
व्यंग वाणों से बचने के लिए
सीधे बने रहने के लिए
यह तक भूल जाते
है आवरण बहुत झीना
जाने कब हट जाए
हवा के किसी  झोंके से
कितना क्या प्रभाव होगा
जब बेनकाब चेहरा होगा
सोचना नहीं चाहते
बस यूं  ही जिये जाते
अनावृत होते ही
जो कुछ भी दिखाई देगा
होगी फिर जो प्रतिक्रया
वह कैसे सहन होगी
है वर्तमान की सारी महिमा
कल को किसने देखा है
बस यही है अवधारणा
मनोभाव छिपाने की |


आशा

30 मार्च, 2012

विशिष्ट आमंत्रण

आप को यह सूचित करते हुए मुझे बहुत हर्ष हो रहा है कि  कल  शनीवार दिनांक ३१.३.२०१२ को अपरान्ह ४.३० बजे होटल विक्रमादित्य, रिंग रोड चौराहा, नानाखेड़ा उज्जैन में मेरे कविता संग्रह "अनकहा सच " का विमोचन है,
इस अवसर पर आप सब की उपस्थिति एवं शुभकामनाएं विशेष रूप से अपेक्षित हैं |
कृपया पधार कर समारोह की शोभा बढ़ायें|
आशा सक्सेना

27 मार्च, 2012

बड़ा दिल

तंग दिल हो क्यूँ रहना 
होना चाहिये हृदय बड़ा
कहना है सरल पर
है कठिन कितना
यह दंश सहना |
कहने से कोशिश भी की 
विस्तार किया 
और बड़ा किया 
बड़ा दिल बड़ी बातें 
रह गए सिमट
कर कोने में
 कुछ कष्ट हुआ
जो बढ़ने लगा
 गहराई तक पहुँच गया
तुरत फुरत 
डाक्टर तक पहुँचे 
शल्य चिकित्सा की सलाह ने 
आई .सी.यू.तक पहुँचा दिया 
ढेरों  कष्टों  में दबे 
सहम गये
जब घर को प्रस्थान किया 
सारी जेबें खाली थीं 
पुन:यही विचार आया 
बड़े  दिल का क्या फ़ायदा 
जिसने अस्पताल पहुँचा दिया |
 
 
आशा
 




25 मार्च, 2012

प्रारब्ध

जगत एक मैदान खेल का 
हार जीत होती रहती 
जीतते जीतते कभी 
पराजय का मुंह देखते 
विपरीत स्थिति में कभी होते 
विजय का जश्न मनाते |
राजा को रंक होते देखा 
रंक कभी राजा होता 
विधि का विधान सुनिश्चित होता 
छूता कोई व्योम   की ऊंचाई 
किसी  के हाथ असफलता आई |
प्रयत्न है सफलता की कुंजी 
पर मिलेगा कितना
  होता सब  पूर्व नियोजित 
उसी ओर खिंचता  जाता
प्रारब्ध उसे जहां ले जाता 
कठपुतली सा नाचता 
भाग्य नचाने वाला होता
हो जाती बुद्धि भी वैसी 
जैसा ऊपर वाला चाहता|
कभी जीत का साथ देता 
कभी हार  अनुभव करवाता 
मिटाए नहीं मिटतीं 
लकीरें हाथ की
श्वासों की गति तीव्र होती 
एकाएक धीमी हो जाती 
कभी  थम भी जाती
जन्म से मृत्यु तक \
सब  पूर्व नियोजित होता 
हर सांस का हिसाब होता
उसका लेखा जोखा होता
शायद यही प्रारब्ध होता |
आशा






22 मार्च, 2012

परोपकार करते करते

रात अंधेरी गहराता तम
 सांय सांय करती हवा 
सन्नाटे में सुनाई देती 
भूले भटके आवाज़ कोइ 
अंधकार  में उभरती 
निंद्रारत लोगों में कुछ को
 चोंकाती विचलित कर जाती 
तभी हुआ एक दीप प्रज्वलित 
तम सारा हरने को 
मन में दबी आग को
 हवा देने को 
लिए  आस हृदय में 
रहा व्यस्त परोपकार में
जानता है जीवन क्षणभंगुर 
पर सोचता रहता अनवरत
जब सुबह होगी 
आवश्यकता उसकी न होगी 
यदि कार्य अधूरा छूटा भी
एक नया दीप जन्म लेगा 
प्रज्वलित होगा 
शेष कार्य पूर्ण करेगा 
सुखद भविष्य की
 कल्पना में खोया 
आधी  रात बाद सोया 
एकाएक लौ तीव्र हुई 
कम्पित  हुई 
इह लीला समाप्त हो गयी 
परम ज्योति में विलीन हो गयी |

आशा






19 मार्च, 2012

जाना है चले जाना

वह राह दिखाई देती है 
जाने से किसने रोका है 
यह प्यार है कोइ सौदा नहीं
जाना है चले जाना 
पर लौट कर न आना 
अच्छा नहीं लगता 
हर बात दोहराना 
बेसिरपैर की बातों को 
दूर तक ले जाना 
कटुता  बढती जाएगी 
कभी कम न हो पाएगी 
साथ साथ  रहते रहते 
यदि  कम भी हुई तो क्या
जाने कब सर उठाएगी 
उठे हुए सवालों का 
सुलझाना इतना सरल नहीं 
जब कोइ समानता नहीं 
क्या लाभ लोक दिखावे का 
केवल नाम के लिए 
ऐसा रिश्ता ढोने का 
है  रीत जग की यही 
जो जैसा है बदल नहीं सकता
स्वीकार  करे  या न करे 
यह खुद पर निर्भर करता है
दो प्यार करने वालों का
हश्र यही  होता है |
आशा