05 अगस्त, 2021

हाइकु (मित्र दिवस )

 



१-कहना नहीं

कुछ करना चाहे

इस काल में 

जीवन भार 

अब सहा न जाए

मैं क्या करूं 

३-तेरी निगाहें

तरकश का बाण

घायल करे

४-चपल हुई

जब भी मुस्कुराई

कितना रोकूँ

५- कहना है  क्या

उसको कहने दो

उदास न हो

६-छोड़ा दामन

बेघर होने लगा

किस के लिए

७-कविता लिखी

मन का भार छटा

प्रफुल्ल हुआ 

८-मन क्या है 

जब  समझ लिया

सोच के देखा 

९-प्यार किसी का 

भार नहीं मन का 

जियो खुशी से 

१०-मित्र दिवस 

मनाया है  फिर भी 

मीत न मिला 

११-स्वप्न दिखा है 

दिल बैठ रहा है 

होगा  जाने क्या  

आशा  


झ छटा

जज्वा होना चाहिए


 

ख्यालों की दुनिया में

 कामयाबी का स्थान कहाँ

जहां अपने पैर  पसारे

उसे ऐसे ही ठेल दिया जाता है |

मन पर पाषाण रख

कितनी कठिनाई से

उनका बोझ  सहन

 किया जाता है

कोई मन से पूंछे  |

ख्याल तो ख्याल ही हैं

उनसे कैसी दूरी

जीने का आनंद नहीं रहता

बिना ख्वावों ख्यालों के |

सच कहा जाए  

तभी जिन्दगी सवरती हैं

जब कुछ सपने हों

साकार करने को |

केवल ख्यालों  से कोई

 हल नहीं निकलता

जज्बा भी होना चाहिए सफलता का

 किला फतह करने को  |

आशा

04 अगस्त, 2021

कुछ नया लिखूं


 

तैरती  भावों के सागर में

अनोखा एहसास जगा मन में

जब भावों ने करवट बदली

नवीन शब्दों का खजाना मिला|

मन का  उत्साह  तरंगित हुआ

प्यार का फसाना तो सब गाते हैं

सत्य का सामना कम ही कर पाते हैं 

कलम जब गति पकड़ती है  

नई रचना उभर कर  आती है | 

रस छंद अलंकार से दूर बहुत

 शब्दों को लिपि बद्ध कर

एक नई रचना का रूप दिया 

 खुद ही प्रसन्न हो कर जो लिखा  

मन को बड़ा  सुकून मिला |

प्राकृतिक आपदा का शोर आज कल  

अधिक सुनाई देता

उस पर  लिखने को प्रेरित करता |

  उतंग लहरे महा सागर की 

जब  उत्श्रंखल  होतीं

किनारे के पेड़ टूटते बहनें लगते

 रास्ते अवरुद्ध करते 

 तवाही इतनी होती कि

 भुलाना मुश्किल होता

वर्षों के  बसे बसाए  घर

 पल भर में नष्ट हुए   |

नेत्रों से बहते अश्रु

 थमने का नाम न लेते

गहरी सोच उभर कर आती

पर निदान खोज न पाती

 आधी उम्र घर  बनाने में बीती 

फिर से सवारने में तो 

सारा जीवन समाप्त हो जाए |

यह कैसा न्याय प्रभू तुम्हारा

क्यों आम आदमी ही पिसता जाता

धनवानों से दूर कष्ट रहते

जब भी आपदा आती 

वे पहले से किनारा कर लेते |

वही शब्द वही कहानी

शब्दों की हेराफेरी सामने आती 

कुछ भी नया नही है 

फिर भी लिखने की फितरत बहुत पुरानी है | 

आशा







फिर भी लिखने की फितरत बहुत पुरानी है |

03 अगस्त, 2021

विचलन


 

नेत्र बंद करते ही रोज रात में

सपने आते रहते जाते रहते

 मन को विचलित करते  रहते   

 दहशत बन कर छा जाते |

कितने  किये टोटके कई बार

पर कोई हल न निकला

जीवन पर प्रभाव  भारी  हुआ

सुख की नींद  अब स्वप्न हुई |

कितनी बेचैनी में कटती रातें

मेरा कल्पना से बाहर थीं

प्रातःनयन खुलते ही वे स्वप्न

  अपना प्रभाव छोड़ कोसों दूर चले जाते|

 किसी ने कहा चाकू सिरहाने  रखो

उसे साफ कर तकिये के नीचे रखा

फिर भी उनसे  पीछ न छूटा

जीना मुश्किल हुआ |

डर ऐसा बैठा मन  मस्तिष्क में

पलक झपकाने का साहस न हुआ

जाने कितने उपाय पूंछे सब से

 रातें कटने लगीं जागरण में |

ईश्वर भजन से कोई अच्छी दवा न मिली

अब रोज रात हाथ जोड़ कर

ईश वन्दना करता हूँ स्वप्नों से  मुक्ति मिले  

मन की शान्ति के लिए दुआ मांगता हूँ |

आशा

02 अगस्त, 2021

मन की आवाज

सुनो  बावरे

अपने मन की आवाज

क्यों दीवाने  हुए  

 दूसरों की बातों में उलझे  |

 अपने मन की सुनो  

उसी के अनुसार चलो  

 बंद ताले दिमाग के

तब ही  खुल पाएंगे  |

 हो शांत चित्त यदि  

  उसके अनुसार चलोगे

मस्तिष्क अपने आप

सक्रीय हो गति पकड़ेगा |

जीवन का कोरा  केनवास

मन को  दिखेगा

मन होगा बेताव

उसे रंगने के लिए |

आकर्षक  रंग चुन पाओगे

सदा बहार रंग भरे चित्र

 उभर कर छा जाएंगे  

जीवन को जीवन्त कर जाएंगे  |

आशा

31 जुलाई, 2021

रंगीला मौसम


 

 मौसम आज 

है बहुत रंगीन 

गाई कजरी 

दादरे  सावन के  

बूंदे  बरसें

मन में मिश्री घोलें 

बूँदें टपकें

झर झर कर के

मन मोह लें  

 स्वर लहरी  मधुर 

गीत संगीत

मन को लुभाता है 

 लय  प्रधान 

मीठी मन मोहक

सब को लगे  

सृष्टि की बारिश है

इतनी प्यारी

सावन की कजरी 

ऐसी आवाज  

पर ढोलक बजी  

 पैर न थके 

घूमर कर कर 

घुंगरू सजे 

पैर उठने लगे

थिरक रहे

उस संगीत पर

रौनक  हुई  

हुआ नृत्य मयूर   

बादल आए    

उमढ घुमड़ के  

रौनक बढ़ी

समा हुआ रंगीन

गीत गाने में    

सब हुए मगन

 ठुमक रहे    

नृत्य संगीत पर 

 लहरा रही 

सतरंगी चूनर 

ओढी गोरी ने     

मौसम सुहावना      

कोई न रहा

उससे अनछुआ 

सभी घूमते  

सुरम्य वादियों में

 भीगते जाते 

तरबतर होते

ऋतु है बरसाती    

मन मीत आने की  |

आशा

 

30 जुलाई, 2021

रिश्ते


 


दोनो ओर के रिश्ते

धन और ऋण से होते 

पर जताते नहीं कभी

वे कैसे होते |

हैं सतही या खून के

जब आवश्यकता होती

तभी दिखाई देते

समय पर पहचाने जाते |

कभी विरोधाभास होता दौनों में

 कमी उजागर हो जाती

जब बरता जाता दौनों को

हैं इतने नाजुक कच्चे सूत से |

इन्हें  निभाना है  एक कला  

अधिकाँश  होते अनजान

कुछ गिने चुने लोगों के सिवाय

वे ढोल पीटना  जानते |

 रिश्ते की नजाकत

जब  नहीं  समझते

कहाँ तक सोचें कितना निभाएं

वाडे निभाएं जान से ज्यादा  

बरसाती मेंढक से नहीं |

वही सही रिश्ते निभा पाते  

अपने पराए का भेद समझाते

बुरे वक्त में साथ रह हिम्मत दिलाते |

आशा

 

29 जुलाई, 2021

लम्हे


                                           भूल  तुमने  न की  थी

शायद यही लिखा था प्रारब्ध में

किसी ने की थी  बुराई

 तुम्हारे नाम आई  |

जीवन में कई पल आते  

अनजाने में होते  ऐसे  

करता कोई कुछ है

भरता कोई और है |

मन पर सीधा प्रहार होता  

शब्दों के विष बुझे बाणों का

तब  कोई साथ नहीं देता

 खुद ही सहना पड़ता  |

क्या  बच  नहीं सकते प्रपंचों से 

क्यों नहीं ? रहें तटस्थ यदि

चलें निश्प्रह हो कर

दुनिया के छल छिद्र से  दूर|

जितनी सावधानी से

सतर्क हो कदम फूँक कर रखोगे

दुनिया के पंक से दूर रहोगे

 समय की कीमत समझोगे |

आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

28 जुलाई, 2021

उसकी क्या खता है


 

उसकी  क्या खता है

एक निगाह में देखा था   

तुमने ही पसंद किया था

 तुम्हारे योग्य समझ  |

सभी सर्वगुण संपन्न नहीं  होते

क्या तुम में कमी कोई नहीं

बह भी  निभा रही साथ तुम्हारा

 हर बात तुम्हारी  मान लेती सही समझ  |

 विवाह  एक समझोता है आज

 विश्वास पर टिका है  

पवित्र बंघन पति पत्नी के बीच आज

   रिश्ता नहीं  जनम जनम का |

वैसे किसी ने देखा नहीं है  

जन्म जन्मान्तर का चक्कर

 दौनों को ही झुकते देखा 

 समय की नजाकत देख |  

किसी को क्या दोष देना

भाग्य में पहले से ही लिखा है

जो ना मिला वह पत्थर था

जिसको पाया वही सच्चा  मोती है  |

 समझदारी, व्यवहारिक बुद्धि है आवश्यक

 जीवन की नैया चलाने को

 जल के बहाव के संग बहना है

यदि समाज में रहना है |

जब  नियम  न पालोगे   

डूबेगी नैया मझधार में बच न पाओगे  

 भव सागर के दलदल से 

 फँस कर रह जाओगे उसमें  |

आशा